कुल्लू । वर्ष 1660 से शुरू हुए कुल्लू दशहरा महोत्सव के इतिहास में पहली बार कोरोना के चलते भगवान रघुनाथ की रथयात्रा में मात्र आठ देवी-देवता और 200 देवलुओं, कारकूनों और राज परिवार के सदस्यों ने भाग लिया। सात दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरे का रविवार को शुभारंभ रस्मी अंदाज में हुआ। शाम पांच बजे माता भेखली का इशारा होते ही रथयात्रा शुरू हुई।
हर साल हजारों की संख्या में लोग और 300 के करीब देवी-देवता शिरकत करते थे। इस बार न देव-मानस मिलन हुआ और न ही रथयात्रा में भव्यता नजर आई। हालांकि, आस्था के चलते ढालपुर और शहर में सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु पहुंच गए, लेकिन पुलिस-प्रशासन ने उन्हें बेरिकेड लगाकर आगे जाने से रोका। दोपहर तीन बजे पुलिस के कड़े पहरे में ढोल-नगाड़ों, नरसिंगों और शहनाई की स्वरलहरियों के साथ भगवान रघुनाथ पालकी में सवार होकर ढालपुर मैदान पहुंचे।
रथ पर विराजमान रघुनाथ के दाईं तरफ पीज के अधिष्ठाता देवता जमदग्नि ऋषि चले। इसके अलावा देवी हिडिंबा, बिजली महादेव, देवता आदी ब्रह्मा, लक्ष्मी नारायण, देवता गोहरी, त्रिपुरा सुंदरी और देवता धूमल ने रथयात्रा में शिकरत की। हालांकि दशहरे में इस बार कुल 11 देवी-देवता पहुंचे हैं।
न्योता सात देवताओं को था, लेकिन ट्रैफिक के देवता धूमल नाग समेत चार और देवता समारोह में बिना बुलाए पहुंचे। कोरोना के चलते इस बार मात्र देव परंपरा की रस्में ही निभाईं। रघुनाथ की यात्रा के दौरान ‘अठारह करडू की सौह’ जय श्रीराम के उद्घोष लगे। मान्यता है कि भगवान रघुनाथ का रथ खींचने से पापों से मुक्ति मिलती है। अगले छह दिन तक रोजाना दशहरे की परंपराएं निभाई जाएंगी।