खुद को कैदी न समझें, जानिए 350 वर्ष पहले खुद को क्वारंटीन करने वाले गांव की कहानी !

क्वारंटीन…! हमारी देसी डिक्शनरी में अब यह शब्द नया नहीं रह गया है। इसका मतलब बच्चा-बच्चा जानता है। खुद को घर में कैद कर लेना, समाज से दूरी बना लेना, खुद में खुद को समेट लेना। बस यही तो क्वारटीन है। कोरोना संक्रमण से खुद को बचाने का एकमात्र विकल्प यही है। मगर दिक्कत यह
 

क्वारंटीन…! हमारी देसी डिक्शनरी में अब यह शब्द नया नहीं रह गया है। इसका मतलब बच्चा-बच्चा जानता है। खुद को घर में कैद कर लेना, समाज से दूरी बना लेना, खुद में खुद को समेट लेना। बस यही तो क्वारटीन है। कोरोना संक्रमण से खुद को बचाने का एकमात्र विकल्प यही है। मगर दिक्कत यह है कि कुछ लोग इस इससे भी तंग आ रहे हैं। मनुष्य मिलनसार प्राणी है। समाज के बिना गुजारा संभव नहीं है। फिर भी खुद को जिंदा रखने के लिए हम सब एक-दूसरे से दूर हैं। फिर भले ही कितना ही अकेलापन महसूस हो रहा हो, मगर जरूरी है। अब आज की ये जरूरत बहुत ज्यादा परेशान कर रही है तो आपको 350 साल पहले की एक घटना के बारे में जरूर जानना चाहिए।

यह घटना “ग्रेट प्लेग ऑफ लंदन” के दौरान की है। जब एक गांव के लोगों ने महामारी को रोकने के लिए खुद को अपने आप ही क्वारंटीन कर लिया था। गांव ने मौत को अपने दरवाजे से बाहर नहीं जाने दिया। तो चलिए जानते हैं लंदन के पास बसे एक वीरान गांव एयम का किस्सा, जो आज एक म्यूजियम बन चुका है। हम आज जिस क्वारंटीन में जी रहे हैं यह उस क्वरांटाइन से लाख दर्ज बेहतर है जो 350 साल पहले एयम गांव के लोगों ने भोगा था।  इसलिए खुद को कैदी न समझें, बल्कि ये मानें कि आपका घर पर रहना दुनिया को सुरक्षित रखेगा।

…खुशियों से भरा एक एयम गांव, हो गया विरान
1665-66 की बीच इंग्लैंड में भयानक प्लेग के कहर था। जब से दुनिया में कोरोना ने तबाही मचाना शुरू की है, तब से प्लेग के उस दौर को कई बार याद किया जा चुका है। “ग्रेट प्लेग ऑफ लंदन” के बारे में कई तरह की कहानियां कही गईं, पर सबसे दर्दनाक और सीख देने वाली कहानी है एयम गांव की। एयम आज एक पर्यटन स्थल है। ठीक वैसे ही जैसे हमारे राजस्थान का कुलधरा गांव। गांव जहां एक वक्त में इंसान रहते थे, खुशियां थीं, त्यौहार थे, मेले थे और फिर अचानक ऐसे वीरान हुआ कि दोबारा बस नहीं सका। एयम के वीरान होने की कहानी 350 साल पहले की है।

प्लेग महामारी से 75,000 लोगों की हुई थी मौत

गांव लंदन से तक़रीबन 3 घंटे की दूरी पर डेर्बीशायर डेल्स जिला में है। गांव के बाहरी हिस्सों में अब भी हजार से कम लोग रह रहे हैं, मगर गांव का मुख्य हिस्सा प्लेग महामारी के बाद से पूरी तरह वीरान है। प्लेग ने 1665-66 में तकरीबन 14 महीनों तक इंग्लैंड के विभिन्न इलाकों, खासतौर पर लंदन और उसके इर्द-गिर्द के क्षेत्रों में खूब तबाही मचाई। सरकारी रिकॉर्ड अनुसार, इस महामारी से 75,000 लोगों की मौत हुई थी। हालांकि, कई इतिहासकार दावा करते हैं कि 1 लाख से ज्यादा लोग मौत में मुंह में समा गए थे। खैर, किस्सा प्लेग से मौत के आंकड़ों का नहीं, बल्कि साहस का है। क्योंकि इस गांव के लोगों ने अपनी जान पर खेल कर संक्रमण को फैलने से रोका। अगर उस दौर में एयम गांव के लोगों ने पूरे गांव को क्वारंटीन नहीं किया होता, तो मौत का रिकॉर्ड भी नहीं बनाया जा सकता।

दर्जी के लाए कपड़े के थान से फैली थी गांव में महामारी  
पूरे लंदन में प्लेग फैल रहा था, तब कुछ समय तक एयम सुरक्षित था। वजह ये थी कि लोग गांव से कम ही बाहर जाया करते थे। लेकिन खतरे से बेखबर गांव का दर्जी अलेक्जेंडर हैडफील्ड लंदन पहुंचा, जहां से उसने कपड़े का थान खरीदा। वह नहीं जानता था कि जो थान खरीदा है, वह प्लेग फैलाने वाले पिस्सू से संक्रमित है। थान गांव पहुंचा और उसकी दुकान में काम चलता रहा। पर हफ्ते के भीतर उस सहायक जॉर्ज विकर्स की मौत हो गई, जिसने बंडल को खोला। हफ्तेभर के भीरत वह जिन-जिन लोगों से मिला थे, वे सभी संक्रमित हो चुके थे और धीरे-धीरे एक चेन तैयार हो गई। संक्रमण पूरे गांव में फैला।

सीखा खुद को क्वरांटाइन करना
सितंबर से दिसंबर 1665 तक 42 ग्रामीणों की मौत हो गई। 1666 की शुरूआत में लोगों ने गांव से बाहर निकलने की योजना बनाई, ताकि बचे हुए लोग सुरक्षित रहें। हालांकि गांव के रेक्टर विलियम मोम्पेसन और निष्कासित पूर्व रेक्टर थॉमस स्टेनली ने ग्रामीणों को समझाया कि ऐसा करना ज्यादा खतरनाक है। क्योंकि गांव के बाहर भी महामारी का प्रकोप था। अब एक ही रास्ता था खुद को कैद करना। वो भी कुछ इस तरह कि बीमारी आसपास के उन गांवों में न फैले जहां तक अभी संक्रमण नहीं पहुंचा था। हालांकि, इसके लिए लोगों को राजी करना इतना आसान नहीं था। लेकिन अधिकांश ग्रामीण ने फैसले के लिए स्वीकार किया, जिन्होंने नहीं किया वे गांव से बाहर निकल गए। मगर उनमें से कभी कोई लौटकर बाहर नहीं आया। खैर 24 जून 1666 को गांव के सारे रास्ते बाहरी लोगों के लिए बंद कर दिए गए।

दीवार से छेद से पहुंचाया जाता था जरूरी सामान
गांव के चारों ओर एक पत्थर की दीवार बना दी गई। जिसे आज भी “मोम्पेस्सन वेल” के नाम से जाना जाता है। दीवार में एक छोटा सा छेद रखा गया। उससे गांव वाले चंद सिक्के बाहर फेंक देते थे और दूसरे लोग जो मदद करना चाहते थे, वे इस छेद से दूसरी जरूरत की चीजें पहुंचा देते थे। इससे महामारी गांव से बाहर तो नहीं गई पर गांव से भी गई नहीं। लोगों ने अपने घरों के भीतर ही जमीन खोदकर सुरंगें तैयार कीं। घर की महिलाएं और बच्चे इसी सुरंग में रहते, ताकि उन्हें जिंदा रखा जा सके। प्लेग से मरने वालों की लाशें गांव से काफी दूर जंगलों में दफनाई जानें लगी। अंतिम संस्कार की प्रक्रिया में भी गांव वालों के जुटने पर रोक लगा दी गई। कोई अपने घर से बाहर नहीं निकलता था। सब कुछ बंद कर दिया गया।

लोग मरते रहे, ताकि दूसरे जिंदा रहें
गांव में मौत का सिलसिला जारी रहा, क्योंकि संक्रमण गांव के भीतर ही था। संक्रमण का सबसे विकराल रूप अगस्त 1666 में दिखाई दिया। गांव में एक दिन के भीतर 5 से 6 मौते होने लगी। कोई घर ऐसा नहीं था, जहां किसी का शव न हो। इतिहास में एक औरत का जिक्र है। नाम था एलिजाबेथ हैनकॉक। इस महिला ने केवल 8 दिन के भीतर अपने पति और 6 छोटे मासूस बच्चों को दम तोड़ते देखा। कहा जाता है कि लोग इतना डरे हुए थे कि कोई उसकी मदद के लिए आगे नहीं आया। तब भी नहीं, जब वह अकेले कब्र खोदती थी। लोग गांव की पहाड़ी स्टोनी मिडल्टन पर खड़े होकर बस देखते रहते थे। एलिजाबेथ रोज अपने घर से एक लाश घसीट कर लेकर आती, रोज कब्र खोदती और उन्हें दफनाती। धीरे-धीरे संक्रमितों की संख्या इतनी ज्यादा हो गई कि गांव के अधिकांश परिवार ही खत्म हो गए। मगर सबने धैर्य का परिचय दिया और बीमारी को दूसरे गांव तक नहीं फैलने दिया।

…और धीरे-धीरे खाली हो गया मुख्य गांव 
मोम्पेसन ने अपनी डायरी में लिखा है कि, वह दौर बहुत भयानक था पर ग्रामीणों का अपने ईश्वर में इतना ज्यादा विश्वास था कि वे मौत से घबराए नहीं। वे भागे नहीं, डटे रहे, ताकि बाकी दुनिया सुरक्षित रहे। हजारों मौत के बाद सितंबर-अक्टूबर में संक्रमण के मामले कम होने लगे और फिर 1 नवम्बर को बीमारी अचानक गायब हो गई। पर इस दौरान एयम ने अपने आधे से ज्यादा परिवार खो दिए। सरकारी दस्तावेजों की मानें तो एक साल के भीतर गांव के 76 परिवारों के 260 लोग मौत का शिकार हो गए। जबकि उस वक्त गांव की कुछ आबादी 800 से भी कम थी। महामारी का प्रकोप खत्म हो जाने के बाद भी एयम के लोग खुद को क्वारंटीन रखने के आदि हो चुके थे, या यूं कहें कि वे डरे हुए थे। कई वर्षों बाद लोगों ने खुद को बाहर निकालना शुरू किया और फिर धीरे-धीरे मुख्य गांव खाली हो गया। आज एयम एक पर्यटक स्थल बन चुका है। जहां लोग प्लेग के भयानक प्रकोप और दर्दनाक कहानियों को महसूस करते हैं।