यह है स्वर्णिम हिमाचल रथ यात्रा! सिर्फ प्रचार पर नहीं, सुविधाओं पर भी पैसा खर्चो सरकार
'आजादी का अमृत महोत्सव' और 'स्वर्णिम हिमाचल रथ यात्रा' केंद्र सरकार व हिमाचल प्रदेश सरकार के इस साल के सबसे बड़े दो कार्यक्रम हैं। 'आजादी का अमृत महोत्सव' का उद्देश्य आजादी के 75 वर्ष पूरे होने और इन इन 75 वर्षों में देश द्वारा हासिल की गई उपलब्धियों के बारे में नागरिकों को अवगत करवाना है। वहीं 'स्वर्णिम हिमाचल रथ यात्रा' का मकसद भी ऐसा ही है। हिमाचल के गठन और पूर्ण राज्यत्व का तमगा मिलने के बाद की उपलब्धियों का रथ यात्रा से लोगों में प्रचार करना है। मगर हिमाचल प्रदेश से ऐसी तस्वीरें भी देखने को मिलीं हैं, जो सिर्फ उपलब्धियों के नाम पर खर्च किए जा रहे करोड़ों रुपये का दुरुपयोग होने का संदेह मन में पैदा करती हैं।
दुरुपयोग का संदेश इसलिए, क्योंकि अभी भी हिमाचल के हजारों लोगों को मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। ताजा उदाहरण हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिला का है। जिला कुल्लू की सैंज घाटी के ग्रामीण अभी भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। घाटी की ग्राम पंचायत गाड़ापारली है। पंचायत सड़क से नहीं जुड़ पाई है। बीमारी की सूरत में लोगों को सिवा खुद को कोसने के कुछ नसीब नहीं होता है। सोमवार को गाड़ापारली पंचायत के मेल गांव की गर्भवती महिला मथुुरा देवी को प्रसव पीड़ा के बीच डंडों पर कुर्सी बांधकर, पैदल चलकर, आठ किलोमीटर दूर निहारनी सड़क तक पहुंचाना पड़ा। बरसात और संकरे रास्ते में महिला को सड़क तक पहुंचे में छह घंटे लग गए।
प्रसव पीड़ा अधिक होने के कारण महिला अस्पताल तक नहीं पहुंचाया जा सका। रास्ते में ही प्रसव करवाना पड़ा। प्रसव के बाद जच्चा-बच्चा को उप स्वास्थ्य केंद्र सैंज ले जाया गया, जहां दोनों का स्वास्थ्य ठीक है। ग्राम पंचायत प्रधान यमुना देवी ने कहा कि सोमवार को मथुुरा देवी को प्रसव पीड़ा होने पर डंडों पर उठाकर उपचार के लिए ले जाना पड़ा है। प्रशासन और सरकार से सड़क के निर्माण की मांग की जाती रही है लेकिन स्थिति जस की तस है। उन्होंने कहा कि पिछले ढाई हफ्तों में तीन महिलाओं को उपचार के लिए उठाकर ले जाना पड़ा है।
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सड़क सुविधा न होने की वजह से ग्राम पंचायत गाड़ापारली की जनता की परेशानियां कभी कम नहीं हो रही हैं। ग्रामीणों को राशन से लेकर हर तरह की आवश्यक सामग्री पीठ पर उठाकर पैदल 8 से 25 किलोमीटर सफर करना पड़ता है। सबसे अधिक समस्या ग्रामीणों को किसी के बीमार होने पर आती है। ऊबड़-खाबड़ और फिसलन भरे रास्तों पर मरीज को सड़क तक पहुंचाना ग्रामीणों के लिए परेशानी बन जाता है। अब ऐसे मामले सामने आने के बाद तो प्रदेश सरकार का यह प्रचार-प्रसार अभियान कहीं न कहीं खोखला ही प्रतीत होता है। बेशक विकास कार्य हुए हों, मगर जब आम लोगों को सुविधा ही न मिले तो ऐसे दावों का क्या फायदा ?